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बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

पादुका पुराण


रोज़ दफ्तर जाने की तैयारी में तमाम छोटे-मोटे काम शामिल हैं। जूतों पर पॉलिश करना भी उनमें से एक है। जूते पर ब्रश मारते-मारते दिमाग़ में यह सवाल कौंध गया कि जूते का आविष्कार कब और कैसे हुआ होगा और किस महान हस्ती ने इसे बनाया होगा। शुरू-शुरू में जूते पहनने पर लोगों ने कैसा महसूस किया होगा और उन्हें जूते पहने देखकर दूसरे लोगों ने क्या प्रतिक्रिया दी होगी? वैसे जब से इंसान ने जूते पहनना शुरू किया है, तब से यह न सिर्फ़ हमारी ज़िन्दगी का बल्कि भाषा और साहित्य तक का अभिन्न अंग बन चुका है। हिन्दी और अंग्रेजी के तमाम मुहावरों और कहावतों में जूता जम कर बैठ चुका है। अन्य भाषाओं का मुझे ज्ञान नहीं है, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि वहाँ भी जूते के क़दम पड़ चुके होंगे। हिन्दी में तमाम ऐसे मुहावरे हैं जिनमें जूतों की महिमा देखने को मिल जाती है। जैसे- मियाँ की जूती मियाँ के सिर, गाय मारकर जूता दान, जूतों का हार पहनाना, जूते चाटना, जूतियाँ चटकाना, जूते घिसना, जूते पड़ना, जूते के बराबर न समझना, चाँदी का जूता मारना, सौ-सौ जूते खायं तमाशा घुस के देखन जायं, जूतमपैजार होना आदि।

जूते को हम पनही या पादुका भी कहते हैं। जूता किस चीज़ का बना है, यह बात बहुत मायने रखती है। जूता चमड़े का हो तो पशुप्रेमी नाराज़ हो उठते हैं, प्लास्टिक का हो तो पर्यावरण प्रेमी और अगर चाँदी का हो, जो कि केवल प्रतीकात्मक अर्थ में होता है, तो वामपंथी आग उगल सकते हैं। जूता किसका है अथवा नहीं है, इस बात से भी बहुतों को बहुत फ़र्क पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास के जीवन की एक घटना इसी बात से जुड़ी हुई है। कहते हैं कि तुलसीदास को जीवन के आरम्भिक दिनों में भयंकर गरीबी और भुखमरी का सामना करना पड़ा। एक बार एक जगह रामकथा के साथ भण्डारे अथवा भोज का आयोजन था। भोजन करने वालों को भोजन पात्र अपने साथ ही लेकर आना था। तुलसीदास भी भोजन करने पहुँचे। जब भोजन परोसने वाले ने पूछा, ‘’दाल किसमें लेंगे?” तुलसीदास ने वहाँ पड़े जूतों में से एक जूता उठाकर कहा, ‘’इसी में परोस दो। हरिभक्त की पनही से अधिक पुनीत पात्र और क्या हो सकता है?” जूते जैसी वस्तु भी भक्ति अथवा प्रेम का आधार बन सकती है, यह इस बात पर निर्भर है कि वह जूता किसका है या नहीं है। सुदामा जब अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे, तो उनके काँटों से छलनी पैरों को देखकर कृष्ण बहुत रोये थे क्योंकि सुदामा भयंकर गरीबी के कारण पादुकाहीन अवस्था में ही आये थे। जूते की बात चली है, तो अवध के नवाब वाजिद अली शाह का किस्सा कैसे भूल सकते हैं। कहते हैं जब अंग्रेज़ फौज अवध पर कब्ज़ा कर चुकी थी और महल में घुसने ही वाली थी, उस समय भी वाजिद अली शाह खु़द अपने हाथों से जूते पहनने को राज़ी नहीं थे और अपने नौकर को जूते पहनाने का हुक्म फरमा रहे थे। नौकर तो जान बचाकर भाग गया लेकिन कहते हैं कि अंग्रेज सेनापति ने उन्हें गिरफ्त में लेने से पहले अपने हाथों से उन्हें जूते पहनाये थे। समकालीन समाज की बात करें, तो हाल ही में एक कॉमेडी शो पर प्रसिद्ध अभिनेता पंकज त्रिपाठी अपना एक संस्मरण सुना रहे थे। बात उन दिनों की है, जब वह दिल्ली के मौर्य शेरेटन होटल में काम करते थे। उसी होटल में एक बार अभिनेता मनोज तिवारी रुके थे। होटल में उनका एक जूता ग़ायब हो गया। पंकज त्रिपाठी ने उसे संभालकर रखा, क्योंकि वह उनके चहेते अभिनेता का जूता था। उनका यकीन था कि उस जूते में पैर डालना उनके लिए अच्छा शगुन साबित होगा। वैसे हमारे समाज में शादी-ब्याह में सालियों द्वारा जीजा के जूते चुराने की रस्म भी बहुत पुरानी है। यहाँ अधिकार का भाव दिखाई पड़ता है। जीजाजी के जूते चुराने और बदले में नेग लेने का हक तो सालियों का ही बनता है।  

जूते घुमक्कड़ी का भी प्रतीक हैं। इसी को ध्यान में रखकर हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी ने ‘बतूता का जूता’ शीर्षक से एक कविता ही लिख मारी है जिसमें मोरक्को से भारत आने वाले प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता की घुमक्कड़ी का ज़िक्र है। इसी कविता की वजह से बॉलीवुड में भी हंगामा मच गया और जूता बहस का केन्द्र बन गया जब फिल्म ‘इश्किया’ में गुलज़ार के लिखे एक गीत ‘इब्नबतूता बगल में जूता’ को उक्त कविता की नकल बताया गया। झगड़े का हल चाहे जिस तरह से निकला हो, लेकिन जूते की अहमियत एक बार फिर साबित हो ही गई। जूते का स्वाद राजनेताओं से लेकर मंचीय कवि और कलाकार भी चख चुके हैं। गाहे-ब-गाहे जूता उन्हें वह शोहरत दिला देता है जो शायद उन्हें दूसरे तरीकों से नसीब नहीं होती।

जूते हमारे व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग भी हैं। कहते हैं कि किसी को पहली नज़र में परखना हो तो उसके चेहरे की तरफ़ नहीं, बल्कि उसके जूतों की ओर देखना चाहिए। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 ज़ाकिर हुसैन जब जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कुलपति थे, तब वह छात्रों को जूते नियमित रूप से पॉलिश करके पहनने की हिदायत देते थे। कई छात्रों पर इसका कोई असर न पड़ता देखकर एक दिन वह स्वयं पॉलिश की डिब्बी और ब्रश लेकर विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर बैठ गये। छात्रों को बड़ी शर्मिन्दगी हुई और अगले दिन से वे पॉलिश किए हुए जूते पहनकर आने लगे। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन रोज़ अपने जूतों पर स्वयं पॉलिश करते थे। एक दिन जब वह अपने जूतों पर पॉलिश कर रहे थे, उनके सेक्रेटरी किसी ज़रूरी काम से उनके कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने हैरत से पूछा, ‘’आप अपने जूतों पर पॉलिश करते हैं?’’ लिंकन ने कहा, ‘’जी हाँ। और आप किसके जूतों पर पॉलिश करते हैं?’’

आम ज़िन्दगी में जूतों को इस्तेमाल करने का एक ख़ास तरीका है, और हम सब उन्हें उसी तरह इस्तेमाल करते हैं। वैसे तो पिछले पाँच सालों से मैं दिल्ली-एनसीआर में रह रहा हूँ, लेकिन मेरी पैदाइश और परवरिश लखनऊ की है। हमारे यहाँ बचपन से ही सिखाया जाता था कि जूतों की एक ख़ास जगह होती है, और उन्हें वहीं रखना चाहिए। बैठक, पूजा के कमरे और रसोईं में जूते या चप्पल पहनकर आने की इजाज़त बिल्कुल नहीं थी। बड़ा होने पर अपने सामाजिक दायरे में अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के यहाँ जाना शुरू हुआ, तब पता चला कि कुछ लोगों के यहाँ बैठक के कमरे में जूते या चप्पल पहन कर जाने की इजाज़त है। चूँकि यह इजाज़त मेरे लिए भी एक सहूलियत थी, सो मैं अक्सर मेजबान से पूछे बग़ैर ही जूते पहन कर सीधे बैठक में घुसने लगा। लेकिन एक बार मेरे एक मेजबान की पत्नी ने टोक दिया कि कृपया जूते बाहर उतार दीजिये। तब से मैं कहीं भी जाता हूँ तो बैठक के बाहर ही जूते उतारने का उपक्रम करते हुए मेजबान की टिप्पणी का इंतजार करता हूँ। अगर यह सुनने को मिले कि ‘अरे यार, ऐसे ही अंदर चले आओ, जूते उतारने की क्या ज़रूरत है’, तो मन बल्लियों उछल पड़ता है और मेजबान के प्रति आदर का भाव बढ़ जाता है। जूतों को बार-बार उतारने और पहनने की समस्या के चलते मैनें बिना फीते वाले जूते भी पहनने शुरू कर दिये हैं।

किसी सार्वजनिक स्थल जैसे मंदिर, दरगाह या तीर्थस्थल आदि में जूते कुछ लोगों के लिए रोज़गार का जरिया भी होते हैं। आप ऐसे स्थानों पर जूते वाले काउन्टर पर जूते जमा करते हैं, जिससे उनका रोज़गार चलता है। जहाँ ऐसे काउन्टर न हों, वहाँ जूते चुराने वालों का रोज़गार चलता है। एक बार प्रसिद्ध साहित्यकार शरत् चन्द्र चटर्जी किसी साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने गये। वहाँ जूते चोरी होने की घटनाओं के बारे में उन्होंने पहले से सुन रखा था, इसलिए वह अपने जूतों को अखबार में लपेटकर मंच पर अपने बगल में रखकर बैठ गये। पास बैठे हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पूछा, “यह पोटली कैसी है शरत्? क्या कोई नई पुस्तक है?” शरत् बाबू झेंप गये। गुरुदेव ने हँसते हुए कहा, ‘’समझ गया। पादुका पुराण है न। दबाकर बैठे रहो।‘’

जूतों को लेकर सबके अलग-अलग शौक और आदतें हैं। कोई फीते वाले जूते पहनता है, तो कोई बिना फीते वाले। किसी को किरमिच पसंद है तो किसी को चमड़ा। कोई अलग-अलग मौकों के हिसाब से अलग-अलग जूते पहनता है तो कोई हर जगह एक ही तरह के जूते पहनकर जाने में ही सहूलियत महसूस करता है। वैसे, जूतों के बारे में आपका क्या ख्याल है?

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शनिवार, 20 सितंबर 2014

शहर बीमार हूँ मैं हॉफता हूँ

गूगल चित्र से साभार
 
हजारों मील हर दिन नापता हूँ।
कभी कायम, कभी मैं लापता हूँ।।

मैं सपनों का उमड़ता इक भँवर हूँ,
तरक्‍की या तबाही का पता हूँ।

है किसमें कितनी हिम्‍मत, कितनी कुव्‍वत,
मैं सबको तोलता हूॅं, भॉंपता हूँ।

मैं कातिल हूँ, लुटेरा हूँ, गदर हूँ,
कहर बन सबके दिल में कॉंपता हूँ।

धुऑं हूँ, शोरगुल हूँ, जिस्‍म-ओ-जॉं तक,
शहर बीमार हूँ मैं, हॉंफता हूँ।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

लबों पे बोल नहीं, पर ज़ुबान रखता हूँ।

लबों पे बोल नहीं पर जु़बान रखता हूँ।
चुके हैं तीर मगर मैं कमान रखता हूँ।

किसी तरह भी मयस्‍सर हो पेट को रोटी,
सुबह से शाम हथेली पे जान रखता हूँ।

कभी कहीं भी खु़द को ओढ़ता बिछाता हूँ,
मैं अपने साथ ही अपना मकान रखता हूँ।

जहॉं भी जाऊँ सवालों के वार होते हैं,
मैं अपने चेहरे पे अपना बयान रखता हूँ।

यही गु़मान है खाकी को मैं ही मुजरिम हूँ,
बकौल खादी मैं वोटों की खान रखता हूँ।

परों ने छोड़ दिया फड़फड़ाना पिंजरे में,
मैं बेकरार हूँ अब भी उड़ान रखता हूँ।

जहां की ठोकरों ने हौसला दिया है मुझे,
मैं अपनी ठोकरों में ये जहान रखता हूँ।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

तबीयत शायराना हो रही है



तबीयत शायराना हो रही है।
मोहब्‍बत एक बहाना हो रही है।

जुबॉं को खोलने से डर रहा हूँ,
कलम मेरा फ़साना ढो रही है।

तुझे सुनने की चाहत अब तो ख़ुद ही,
लगा कोयल का गाना हो रही है।

उमड़ती है मेरे अश्‍कों की गंगा,
करम मेरा पुराना धो रही है।

वो बोले शेर अपने मत पढ़ो तुम,
मोहब्‍बत अब निशाना हो रही है।

शनिवार, 17 मई 2014

लोकतंत्र की राहों में, आया नया घुमाव है देख।

मेला नहीं चुनाव है देख।
सत्‍ता का बदलाव है देख।

हर मत की कुछ कीमत है,
जाग्रति का फैलाव है देख।

हिचकोले खाता था देश,
अब आया ठह‍राव है देख।

खत्‍म एक युग होने को,
आया नया पड़ाव है देख।

लोकतंत्र की राहों में,
आया नया घुमाव है देख।

बुधवार, 26 मार्च 2014

चुनावों का मौसम करीब आ गया है।

चुनावों का मौसम करीब आ गया है।
ज़मीं से फलक पर गरीब आ गया है।

वो चाहे हो एक्टर, प्रोफेसर, गैंगस्टर,
परखने  को अपना नसीब आ गया है।

मचलते हैं  अरमां,  बदलते हैं रिश्ते,
बग़ावत  का  मौसम अजीब आ गया है।

अभी तक जिसे यार कहते थे अपना
उसी की  जगह पर रकीब आ गया है।

लटकने को तैयार  है फिर से वोटर
वो काँधे  पे  लेकर सलीब आ गया है।

शनिवार, 25 जनवरी 2014

मिल गये दिल तो कैसी दूरी है

मिल गये दिल तो कैसी दूरी है।
इश्‍क को हुस्‍न की मंजूरी है।

अब तो हर सांस कह रही है यही,
बिन तेरे जिन्‍दगी अधूरी है।

हर तरफ तीर सी निगाहें हैं,
प्‍यार की राह में मजबूरी है।

मिलेगी मंजिल-ए-मकसूद तुझे,
यकीन-ओ-हौसला जरूरी है।

जिसकी खुशबू से बच सका न कोई,
प्‍यार तो ऐसी ही कस्‍तूरी है।
 

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

मॉं

सुबह स्‍नान कर पूजा करती,
सुरभित कस्‍तूरी है मॉं।

चपल रसोईं में घुस जाती,
बेलन, चमच, छुरी है मॉं।

दादा-दादी, पापा, मेरी
सबकी कमजोरी है मॉं।

थपकी देकर मुझे सुलाती,
मीठी-सी लोरी है मॉं।

भांति-भांति त्‍योहार मनाती,
गीत, भजन, कजरी है मॉं।

पहिये-सा परिवार संभाले,
वह मजबूत धुरी है मॉं।
 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

पठान का सबक

एक बार एक अंग्रेज और एक पठान रेलगाड़ी के एक ही डिब्‍बे में साथ साथ यात्रा कर रहे थे। अंग्रेज को पठान के साथ यात्रा करने में घृणा का अनुभव हो रहा था, किन्‍तु वह विवश था। जब पठान लघुशंका निवारण के लिए गया, तो अंग्रेज ने उसका बिस्‍तर चलती गाड़ी से फेंक दिया। जब पठान वापस आया तो उसका सामान नदारद था। उसने अंग्रेज से अपने सामान के बारे में पूछा। अंग्रेज ने उसकी खिल्‍ली उड़ाते हुए कहा, ''तुम्‍हारा सामान गाड़ी से बाहर टहलने गया है। अभी वापस आ जायेगा।'' पठान सारा माजरा समझ गया, पर वह बोला कुछ नहीं। कुछ देर बाद अंग्रेज सो गया। तब पठान ने उसका सूटकेस उठाकर गाड़ी से बाहर फेंक दिया। कुछ समय बाद जब अंग्रेज की नींद खुली, तो उसने अपना सूटकेस न पाकर पठान से पूछा, ''मेरा सूटकेस कहॉं है  पठान ने उत्‍तर दिया, ''तुम्‍हारा सूटकेस मेरा बिस्‍तर लाने गया है।''

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

पापा जल्‍दी आ जाना



पापा जल्‍दी आ जाना। 
मुझको संग घुमा जाना। 
मैं भी जाऊँगा बाजार। 
और खिलौने लूँगा चार। 

(यह कविता बचपन में कहीं पढी थी। अपने बेटे की इस तस्‍वीर को देखकर यह कविता याद आ गई।)

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

काल्‍ह करै सो आज कर

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर के पास एक याचक सहायता मॉंगने पहुँचा। धर्मराज ने उससे कहा, ''कल इसी समय मेरे सम्‍मुख उपस्थित होना, तुम्‍हें जो चाहिए दे दिया जाएगा।''


युधिष्ठिर के छोटे भ्राता भीम ने उनकी यह बात सुन ली। तुरन्‍त उन्‍होंने राजमहल के सभी सेवकों को बुलाकर घोषणा की कि अगले दिन विजय दिवस मनाया जायेगा। चारों ओर कानाफूसी आरम्‍भ हो गयी। हर कोई जानना चाहता था कि किसने विजय प्राप्‍त की और किस पर। धर्मराज तक भी यह समाचार पहुँचा। उन्‍होंने भीम को बुलाया और उनसे इस उत्‍सव का कारण पूछा।

भीम ने कहा, ''हमने म़ृत्‍यु पर एक दिन के लिए विजय प्राप्‍त कर ली है। धर्मराज ने एक याचक को, जो आज उनके पास सहायता मांगने आया था, कल आने के लिए कहा है। इसका तात्‍पर्य यह है कि धर्मराज को पूर्ण विश्‍वास है कि अगले 24 घण्‍टों तक वह जीवित रहेंगे। क्‍या यह काल पर विजय नहीं है्?''

धर्मराज युधिष्ठिर को तुरन्‍त अपनी भूल समझ में आ गयी। उन्‍होंने तुरन्‍त उस याचक को खोज कर बुलवाया और उसे यथोचित सहायता प्रदान की।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

गुरुदेव की 'गीतांजलि' से


मुक्‍त मन-मस्तिष्‍क हो भय से जहॉं,
गर्व से उन्‍नत जहॉं पर भाल हो।
ज्ञान भी उन्‍मुक्‍त मिलता हो जहॉं,
जाति मजहब का न कोई सवाल हो।
शब्‍द निकलें सत्‍य के ही गर्भ से
श्रेष्‍ठता को हर कोई तैयार हो।
तर्क ही आधार हो स्‍वीकार का,
रूढि़यों से मुक्‍त जन-व्‍यवहार हो।
देशवासी सब प्रगति पथ पर बढ़ें,
शान्ति, उन्‍नति, प्रेम के आसार हों।
हे प्रभू, लेकर तुम्‍हारी प्रेरणा,
स्‍वर्ग ऐसा देश में साकार हो।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

वी लव ओन्‍ली क्रिकेट

इण्डिया ने वर्ल्‍ड कप जीता और पूरे देश में धूम धडाका होने लगा। चलो छुटटी हुई। एक महीने से चल रहा सर्कस खत्‍म हुआ। हर खिलाड़ी को एक एक करोड बीसीसीआई से बतौर इनाम मिल गये। अभी अपनी अपनी राज्‍य सरकारों से मिलने बाकी हैं। यह बात और है कि दूसरे खेलों के खिलाडि़यों के हिस्‍से सिर्फ मूंगफलियां ही आती हैं। उस पर तुर्रा यह कि सरकार ने इस विश्‍व कप का टैक्‍स में रियायत की भी घोषणा कर दी। कोई मनमोहन सिंह जी से पूछे कि क्‍या ऐसी रियायत दूसरे खेलों के आयोजनों को नसीब हुई है। खैर, लगे हाथों मनमोहन सिंह जी ने राजनीतिक अवसरवादिता का परिचय देते हुए गिलानी जी के साथ बैठकर भारत-पाकिस्‍तान मैच देख डाला और आगे की बातचीत की जमीन भी तैयार कर दी। हालांकि जनता अच्‍छी तरह जानती है कि यह सब तमाम घोटालों और विवादों से ध्‍यान बंटाने का हथकण्‍डा भर था। यह कुछ कुछ वैसा ही था जब अमेरिकी राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन पर जब मोनिका लेविंस्‍की प्रकरण पर महाभियोग लाया जाने वाला था, तब उन्‍होंने जनता का ध्‍यान बंटाने के लिए ओसामा को खतम करने के बहाने से अफगानिस्‍तान पर मिसाइलें दागनी शुरू कर दी थीं।

कुल मिलाकर वर्ल्‍ड कप जीतने से सभी को राहत मिली। महीने भर से सरकारी दफतरों से बाबुओं के अक्‍सर गायब रहने का सिलसिला तो थमेगा। छात्रों के अभिभावक राहत की सांस ले रहे हैं कि कम से बचे हुए इम्‍तहान तो बच्‍चे कायदे से दे सकेंगे। खासकर भारत के जीतने के बाद। हारने के बाद तो अवसादग्रस्‍त बच्‍चे फेल होने की ही तैयारी करते नजर आते। गृह मंत्रालय राहत की सांस ले रहा है कि सब ठीक ठाक निपट गया, कहीं कोई आतंकवादी घटना या विस्‍फोट नहीं हुआ। फिल्‍म जगत चैन की सांस ले रहा है कि चलो, अब नई फिल्‍में रिलीज की जा सकती हैं।

लेकिन यह राहत की सांस थोडे समय के लिए ही है। कुछ ही समय बाद आई पी एल के मैच शुरू हो जायेंगे। फिर से एक दूसरा सर्कस शुरू होगा जो कहीं ज्‍यादा रंगीन होगा। साइना नेहवाल और पेस-भूपति के मैच भले ही टीवी पर लाइव न आयें, पर क्रिकेट का प्रसारण निर्बाध जारी रहेगा। हमारा देश क्रिकेट भक्‍त है, यहां आम जिन्‍दगी से लेकर राजनीति, व्‍यापार, धर्म कर्म सब में क्रिकेट शामिल है। यह बात अलग है कि आम जन को इससे कुछ हासिल नहीं होता सिवाय क्षणिक खुशी के, लेकिन इस क्षणिक खुशी के लिए न जाने कितना वक्‍त बर्बाद करना पड़ता है। विचारणीय बात है कि एक शताब्‍दी से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी क्रिकेट अभी तक केवल आठ-नौ देशों में ही लोकप्रिय खेल का दर्जा पा सका है। उसमें भी हम हिन्‍दुस्‍तानियों के बीच यह सबसे ज्‍यादा लोकप्रिय है। कारण साफ है, हमारे पास विश्‍व में सबसे ज्‍यादा फालतू समय है। हम इस फालतू समय का उपयोग क्रिकेट का आनंद लेने में करते हैं। कृपया किसी और खेल का नाम मत लीजिए। वी लव ओन्‍ली क्रिकेट।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

हाय रे महंगाई

अभी शाम को ऑफिस से घर आया ही था कि मॉं ने कहा कि बाजार चलना है, घर में सब्‍जी नहीं है। मैं थका हुआ था सो कह दिया, आप रिक्‍शे से जाकर ले आयें। खैर, मॉं चली गईं। सब्‍जी लेकर वापस घर आने पर उन्‍होंने एक ऐसी ऑंखों देखी घटना सुनाई जिसे सुनकर ताज्‍जुब भी हुआ और सोचने को मजबूर भी हो गया। मेरी मॉं जिस दुकान पर सब्‍जी ले रहीं थीं उसी दुकान पर उन्‍हीं की उम्र की एक महिला, यानी लगभग 55 साल की, सब्‍जी ले रही थी। उसने लौकी खरीद कर अपने थैले में रखी। महिला ठीक-ठाक घर की लग रहीं थीं। अचानक दुकानदार ने उनसे कहा, 'आपने एक बैंगन अपने थैले में क्‍यों रख लिया, आपने तो लौकी खरीदी है।'' इस पर वह महिला नाराज हो गई। मगर दुकानदार भी अड़ गया। उसने कहा कि अपना थैला उलटकर दिखाइये। मजबूरन महिला को अपना थैला उलटना पडा तो उसमें से लौकी के साथ एक हटटा कटटा गोल बैंगन भी धम्‍म से गिरा। दुकानदार बडबडाते हुए बोला, ''अभी इतनी महंगाई में ही आप जैसे लोग चोरी पर उतर आये हैं, थोड़ी और महंगाई बढ़ेगी, तब न जाने क्‍या करेंगे?'' महिला ने किसी प्रकार का विरोध प्रदर्शन नहीं किया. वह बैंगन उन्होंने ही चुराया था.

हाय रे महंगाई, न जाने यह क्‍या क्‍या गुल खिलायेगी।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

चक्कर स्कूल एडमीशन का

14 फरवरी को होता है वैलेन्टाइन डे। लेकिन मैं यहां वैलेन्टाइन डे पर पोस्ट लिखने नहीं बैठा। दरअसल 14 फरवरी’2011 मेरे लिए कुछ दूसरे मायनों में खास रहा। दिन था सोमवार। इसी दिन मैनें अपने बेटे तेजस का स्कूल में प्रि-नर्सरी कक्षा में दाखिला कराया। जनाब 28 अप्रैल को पूरे तीन साल के हो जायेंगें। कुछ अजीब संयोग ही है कि 28 अप्रैल 2008 को मेरे बेटे का जन्म हुआ, उस दिन भी सोमवार ही था। छोटे नवाब दिन भर घर में दून काटते रहते थे। चूँकि  घर में और कोई छोटा बच्चा नहीं है इसलिए बड़ों को दिन भर सर खपाना पड़ता था। बस, एक दिन घर में पंचायत हुई और यह निर्णय हुआ कि बच्चे को स्कूल में दाखिल करा देना चाहिए। तेजस मेरी पहली और अभी तक इकलौती संतान है (हालांकि हम पति-पत्नी की योजना है कि अभी अपने देश पर एक अदद बच्चे का बोझ और डालना है) इसलिए उसके एडमीशन के चक्कर में एक अभिभावक के रूप में स्कूल सिस्टम से भी पहली बार पाला पड़ा। कौन सा स्कूल अच्छा है, किस स्कूल तक आवागमन की सुविधायें अच्छी हैं, किस स्कूल में बच्चों को बहलाने-फुसलाने के साधन जैसे झूले, खिलौने वगैरह अच्छे हैं, किस स्कूल की फीस हमारी औकात के अन्दर है, किस स्कूल की टीचर्स बच्चों को मारती-पीटती नहीं हैं, इन सब प्वाइंट्स पर खूब माथा-पच्ची घर के सदस्यों में हुई। दफ्तर में उन सहकर्मियों के साथ भी विचार मंथन हुआ जिन्होंने हाल ही में अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाया। तब जाकर घर से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित एक स्कूल को फाइनलाइज किया गया। पॉंच हजार रुपये की दाखिला फीस और छह सौ रुपये की मासिक फीस के साथ ही मेरे बेटे का आधुनिक युगीन दीक्षा संस्कार हो गया। यह स्कूल मेरे घर के पड़ोस में स्थित राजाजीपुरम कालोनी में है। दरअसल इस स्कूल की स्टेªटेजिक लोकेशन  ही इसके चुनाव का कारण बनी। जिस सड़क पर यह स्कूल स्थित है उसके सामने वाली सड़क के पीछे की ओर ही मेरी ससुराल भी है। मेरी मध्यमवर्गीय मितव्ययितापरक बुद्धि ने हिसाब लगाया- चूँकि  स्कूल सुबह 9 बजे से 12 बजे तक का है, और मेरा ऑफिस भी सुबह 9 बजे से ही है इसलिये सुबह ऑफिस जाते समय बच्चे को स्कूल छोड़ दूंगा । छुट्टी के बाद मेरा साला अपने भांजे को अपने घर लेता जायेगा। आखिर ससुराल वाले किस दिन काम आयेंगे। रहा ऑफिस वक्त पर पहुँचने का सवाल, तो ऑफिस भी घर से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर है, तिस पर सरकारी नौकरी, तो इतनी लेटलतीफी तो कर ही सकते हैं। इतनी तिकड़म करके स्कूल रिक्शे  के आठ सौ रुपये महीने तो बचेंगे।


हालांकि इतने चक्करदार सिस्टम में मुझे, मेरी पत्नी, मेरे ससुरालियों सबको बड़ी परेशानी  हो रही है, कई बार ऑफिस के लिए कुछ ज्यादा ही देर हो जाती है. किसी दिन तेजस के मामा उसे लेने के लिए देर से स्कूल पहुँचते हैं, उधर स्कूल प्रबंधन भी रोज रिक्शा लगवाने के लिए मनुहार करता है पर मैं बेशर्मी  से मुस्कुराकर मना कर देता हूँ  और आठ सौ रुपये महीने बचाने के सुख का आनन्द लेता हूँ.


बुधवार, 16 मार्च 2011

फिर आ गयी होली

फिर आ गयी होली. वही केमिकल रंगों की लीपा पोती, वही हुडदंग, वही धक्का मुक्की, धींगा मुश्ती और नशेबाजी, होलिका दहन के नाम पर हरे पेड़ों की अँधा धुंध कटाई, यहाँ तक कि अति उत्साह में दूसरों की निजी संपत्ति को भी स्वाहा  कर देने की प्रवृति- कुल मिला कर होली की यही पहचान रह गयी है अब. पिछले दो सालों से मैंने रंग खेलना छोड़ दिया है. कोई घर पर होली मिलने आ भी जाता है तो बस अबीर गुलाल का टीका लगा कर होली मिल लेता हूँ. अब होली खेलने का मन नहीं करता. पहले तो दिन भर खुद को पुतवाओ और दूसरों की लीपा पोती करो उसके बाद मेहनत  करो रगड रगड़ कर उस पेंट  को छुड़ाने में. देह कि दुर्दशा हुई सो हुई, जीवन-तुल्य जल की बर्बादी सो अलग. हाँ, लीपा पोती का  आलम ख़त्म हो जाने के बाद शांति का साम्राज्य स्थापित हो जाता है, तब होली मिलने ज़रूर निकलता हूँ. अब स्कूल कॉलेज के दिनों वाला होली खेलने का जोश नहीं रहा. यह लाइन पढ़ कर गलत फहमी में न आयें, अभी मैं अधेड़ नहीं हुआ, केवल ३० का ही हूँ. लेकिन शायद अब पहले वाला माहौल नहीं रहा जब होली के बारे में कहा जाता था कि इस दिन तो दुश्मन भी गले मिलते हैं. आज के ज़माने में जब दोस्त भी आँखें फेर लेते हों, तब दुश्मन को गले लगाने की  बात बेमानी लगती है.

लेकिन दूसरी ओर  सोचता हूँ कि आज के समय में जब आदमी इतना आत्म-केन्द्रित होता जा रहा है कि उसके पास अपने दोस्तों रिश्तेदारों के लिए समय नहीं है, ऐसे में शायद यही त्यौहार बहाना बन जाते हैं एक-दुसरे से मिलने मिलाने का. इन त्योहारों कि स्थापना करने वाले हमारे पूर्वजों का भी शायद यही उद्देश्य था.

खैर, आप सभी को मेरी ओर से होली की  तमाम शुभ कामनाएं. रंग खेलिए लेकिन ज़रा संभल कर, किसी को नुक्सान न पहुंचे,  खाइए खिलाइए लेकिन होश मत गंवाइये.

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

सच्ची प्रसन्नता का रहस्य

 सर हेनरी वाटन की कविता 'Characters Of A Happy Life' उ.प्र. बोर्ड की इंटरमीडिएट कक्षा में पढ़ी थी और उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ. सीधे सरल शब्दों में रची गयी यह कविता एक वास्तविक सुखी जीवन के रहस्य को बयां करती है. आज इतने बरसों बाद भी यह कविता मेरे जेहन में बसी हुई है. इस  कविता का मैंने भावानुवाद करने का प्रयास किया है. आशा है पाठकों को पसंद आएगा. उक्त भावानुवाद को पढने के लिए कृपया नीचे लिंक पर जाएँ -






रविवार, 27 फ़रवरी 2011

एमपी3 फाइलों में इमेज कैसे इन्‍सर्ट करें?

 kकई बार आपने देखा होगा कि कई एमपी3 फाइलों में फिल्‍म का कवर या अन्‍य कोई इमेज थम्‍बनेल के रूप में दिखाई देती है। आप सोचते होंगे कि एमपी3 फाइल में तस्‍वीर कैसे इन्‍सर्ट की जा सकती है। यह बिल्‍कुल सम्‍भव है, वह भी एकदम फ्री  साफ्टवेयर से। इस  साफ्टवेयर का नाम है एमपी3 टैग। इसे नीचे दी हुई लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं।    


 साफ्टवेयर को अपने सिस्‍टम में इन्‍सटाल कर लें। अब किसी एमपी3 फाइल को इस  साफ्टवेयर में खोलें।  साफ्टवेयर की एक विण्‍डो खुलेगी जिसमें बायीं ओर नीचे एक थम्‍बनेल साइज का बॉक्‍स होगा और दायीं ओर एमपी3 फाइल की लिस्‍ट दिखेगी। आप एक साथ कई एमपी3 फाइलों को भी खोल सकते हैं। ऐसा करना उस वक्‍त फायदेमंद है जब आपको कई फाइलों में एक ही इमेज इनसर्ट करनी हो। बायीं ओर दिये गये थम्‍बनेल बॉक्‍स में राइट क्लिक करने पर 'ऐड कवर' विकल्‍प दिखेगा। इसे क्लिक करने पर प्रोग्राम आपसे इमेज की लोकेशन मांगेगा। लोकेशन बताने पर वह इमेज कवर के रूप में थम्‍बनेल बॉक्‍स में दिखने लगेगी। अब प्रोग्राम विण्‍डो में 'फाइल' टैब पर जाकर 'सेव टैग' विकल्‍प को क्लिक करेंगे तो एमपी3 फाइल अपने मूल लोकेशन में ही इमेज के साथ सेव हो जायेगी।

इस  साफ्टवेयर के माध्‍यम से आप किसी एमपी3 फाइल में अपनी तस्‍वीर या अन्‍य कोई तस्‍वीर लगा सकते हैं। पर इमेज जेपीजी या पीएनजी फार्मेट में होनी चाहिए। एक बात और, यह  साफ्टवेयर केवल एमपी3 ऑडियो फाइल के साथ ही काम करता है, अन्य किसी ऑडियो फार्मेट के साथ नहीं।


बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

फेसबुक जी फेसबुक

फेसबुक जी फेसबुक।
अपनी-अपनी केस बुक।
गोरे-काले चेहरे इसमें,
देस और परदेस बुक।
सच्‍चे-झूठे जाल बनाती,
रिश्‍तों की यह बेस बुक।
सपन सुहाये, अपन पराये,
लगती मन की ठेस बुक।
बिछडों को फिर से मिलवाये,
हो जाती है ट्रेस बुक।
डोनेशन और फरियादों की,
कहलाती है ग्रेस बुक।
क्‍या पहनावा  किसको भाये,
बन जाती है ड्रेस बुक।
मेरे तेरे सबके रंग-ढंग,
दिखलाती हर भेस बुक।
जन-जन को झकझोर जगाये,
हो जाती फिर प्रेस बुक।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

पापा, ये फाउन्‍टेन पेन क्‍या होता है?

आज ही बाजार से अपने तीन वर्षीय बेटे के लिए हिन्‍दी कविताओं की किताब लेकर आया था। मेरा बेटा उत्‍सुकता से किताब के रंग-बिरंगे पन्‍नों को पलटने लगा। एक पन्‍ने पर फाउन्‍टेन पेन का चित्र बना था। उस पर उंगली रखकर उसने कहा, 'पापा, ये देखो पेंचकस।'' मुझे हंसी आ गयी। मैनें उसे समझाने की कोशिश की कि यह पेंचकस नहीं, फाउन्‍टेन पेन है लेकिन वह टस से मस न हुआ। हॉं, उसने यह सवाल जरूर पूछा, 'पापा, ये फाउन्‍टेन पेन क्‍या होता है?' मुझे ध्‍यान आया कि इस बेचारे ने तो कभी फाउन्‍टेन पेन देखा ही नहीं। पेन की निब के आकार को देखकर उसके समतुल्‍य चीज उसे पेंचकस ही समझ में आई होगी।

वाकई फाउन्‍टेन पेन तो मानों बीते जमाने की बात हो गयी है। अब तो घर से लेकर ऑफिस तक सभी बॉल पेन रखते हैं। कोई फाउन्‍टेन पेन इस्‍तेमाल नहीं करता। मुझे याद आ गई बचपन के स्‍कूली दिनों की जब हम फाउन्‍टेन पेन से लिखा करते थे। जब पेन्सिल छोड़कर पहली बार फाउन्‍टेन पेन हाथ में पकड़ी थी, उस समय जो प्रसन्‍नता अनुभव की थी, वह शायद आज ऑफिस में पदोन्‍नति मिलने पर भी न मिले। उस समय 'किंग्‍सन' ब्राण्‍ड का फाउन्‍टेन पेन खूब चलन में था। वह मेरा पसंदीदा पेन हुआ करता था। उसकी प्‍यास बुझाने के लिए 'चेलपार्क' ब्राण्‍ड की स्‍याही की दवात हमेशा मेरे पास तैयार रहती थी। फाउन्‍टेन पेन के इस्‍तेमाल से हमारे हाथ वैसे ही रंगे रहते थे, जैसे पनवाड़ी के हाथ कत्‍थे से रंगे रहते हैं। स्‍याही के धब्‍बे हमारी बेंच, कक्षा की दीवारों, हमारे स्‍कूल बैग और हमारे ड्रेस तक पर होते थे। कई बार तो हम जानबूझकर अपनी ड्रेस पर स्‍याही के दाग लगा लेते थे ताकि देखने वालों पर रोब पड़े कि ये पढ़ीस बच्‍चे हैं। स्‍कूल में जिस दिन होली की छुटटी बोली जाती थी, उस दिन बाहर निकलने पर हम अपने-अपने फाउन्‍टेन पेन खोलकर नीली, हरी, लाल स्‍याही एक दूसरे पर छिड़कते और होली के एक दिन पहले ही स्‍कूली होली मनाते थे। घर पहुँचने पर डांट पड़ेगी, इसकी हमें परवाह न होती।

आज फाउन्‍टेन पेन का स्‍थान बॉल पेन ने ले लिया है। दाग धब्‍बों से कपड़े और हाथ खराब न हों, शायद इसीलिए फाउन्‍टेन पेन चलन से बाहर हो गया। वे दिन कितने अच्‍छे थे, जब हमारे पास हमारा प्‍यारा फाउन्‍टेन पेन होता था और स्‍याही के दाग हमारी ड्रेस की शोभा बढ़ाते थे।